ज्ञान की आंधी

एक बार भाई जोध सिंह नामक एक विद्वान सिख गुरु अंगददेव जी के दर्शन को आये! वह अपने मन से जाति हा अभिमान निकालना चाहते थे! जब उन्होंने गुरु देव के समक्ष यह इच्छा व्यक्त की, तो उन्होंने लंगर की सेवा करने को कहा! गुरु देव की आज्ञा शिरोधार्य कर वह सुबह से शाम तक लंगर में जुटे रहते, साथ ही बर्तन भी साफ़ करते! पंगत में बैठे लोगों का जूठन ही खाकर ही वह अपना पेट भरते! उन्हें ऐसा करते देख एक दिन भाई बुड्ढा जी नामक एक शिष्य ने पूछा, ‘आप लंगर का भोजन कैसे करते हैं?’ तब भाई जोध ने उत्तर दिया, ‘चिड़ियों की तरह चुगता हूँ!’ एक दिन अंगददेव जी पंगत में भोजन कर रहे थे! भाई जोध को पंगत में बैठा देख उन्होंने बुलाकर पूछा, ‘सेवा तो खूब करते हो, मगर लंगर कब छकते हो?’ जोध ने वही उत्तर दिया!

‘यानी तुम जूठन को चुगते हो?’ गुरुदेव ने आश्चर्य से पूछा, फिर कहा, ‘यह ठीक नहीं! तुम्हे स्वच्छ लंगर छकना चाहिए! जूता खाना नम्रता नहीं, हीनता है!’
अब भाई जोध स्वच्छ लंगा छकने लगे! एक दिन भाई बुड्ढा जी ने उन्हें स्वच्छ भोजन करते देखा, तो व्यंग्य से उनसे पूछा, ‘ अरे, पहले तो तुम जूता प्रसाद ग्रहण करते थे, मगर अब स्वच्छ भोजन करते हो? जोध ने जबाब दिया. ‘पहले मेरे अन्दर जाति-अभिमान जैसा चांडाल बस्ता था, जिसे में जूठा प्रसाद देता था! मगर अब मेरे अन्दर गुरूजी का उपदेश बस गया है, इसलिए में उसे स्वच्छ प्रसाद देता हूँ!’ बुड्ढा जी निरुत्तर हो गए!
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